ये बेरुखी कब तक होगी.


ना जाओ छोड़ कर एक दिन बड़ी हसरत होगी.
जरा सी ही सही मेरे लिए उल्फत होगी.
                     मेरे संग रह के तुम्हे गरचे आज अहसास ना हो ,
                      यकीं है मुझको की एक रोज मोहब्बत होगी.
मै छोडकर तेरे दर को ना जाऊंगा हरगिज ,
मै देखता हूँ की ये बेरुखी कब तक होगी.
                          ये मर्ज़ क्या है की जिसने किया जीना दुबर ,
                           ये सोचता हूँ की शायद ये मोहब्बत होगी.
तुम मेरे सब्र का ऐ दोस्त इम्तिहान ना ले ,
कहूँगा कुछ तो कहोगे की बगावत होगी.
                            ना लौटकर कभी आऊं ये सोचता है दिल ,
                           मुझे लगता है की इस पर भी शिकायत होगी.  
पास तन्हाईयाँ दिल तंग परेशान नज़र ,
मेरे हालात पर कब उनकी इनायत होगी.
                     मै चाहता हूँ की देखूं ना तुझे ख्वाबों में ,
                     मेरे ख्वाबों को फिर मुझसे बगावत होगी.
तुम्हारी याद में जीवन का एक हिस्सा गुजरा ,
तेरे आने की ये उम्मीद कहाँ तक होगी.
                     पता नही की ये ''आमिर''किसे तलाश करे ,
                     किसी के दिल में तो इसके लिए चाहत होगी.


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                              ''आमिर दुबई.,,,



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18 July 2012 at 02:04

बेरुखी को दूर करिए..
संवेदनशील रचना..

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18 July 2012 at 03:44

छोड़कर चलते बने तुम, किस ठिकाने पर टिकोगी |
गम बेंचता आऊं उधर ही, दे गए जो मुझे मन भर |

दाल रोटी लूँ कमा मैं , याद में तेरी मरुँ न --
पाव भर बेचूं तुझे भी, चख के करना याद रविकर ||

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18 July 2012 at 03:49

http://dineshkidillagi.blogspot.in/2012/07/blog-post_7335.html

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18 July 2012 at 20:11

सबकुछ छोड़ देगा आमिर
मोहब्बत नहीं छोड़ सकता है
ना मोहब्बतनामा !!

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18 July 2012 at 21:27

मुबब्बत अमर है, अमर ही रहेगी।
हकीकत तो इक दिन कहानी बनेगी।।

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18 July 2012 at 21:30

शुक्रिया ,सभी रीडर्स .आप सब का आभार.

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18 July 2012 at 21:45

बहुत सुन्दर भावपूर्ण ग़ज़ल

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24 September 2012 at 18:35

Ati sundar bhaav, hridaya ko aanand bhibhor kiya is bhav ne....

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31 January 2013 at 10:06

इस बेरुखी पर इतना इतराना क्या
फिर
माँफी माँगने मेँ शर्माना क्या

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