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पिता की महानता

पिता की महानता

डियर रीडर्स , पिता के बारे में इतना सुन्दर किसी ने फेसबुक पर लिखा था ,मुझे इसके अल्फाज़ बहुत पसंद आये ,इसलिए इसे शेयर कर रहा हूँ ,ये उसी भाई को समर्पित करता हूँ ,जिन्होंने इसे लिखा।


4 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा महान है.!
6 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा सबकुछ जानते है.!
10 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा बहुत अच्छे
है,लेकिन गुस्सा जल्दी हो जाते है.!

13 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा बहुत अच्छे थे
जब मैँ छोटा था.!
14 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा बहुत
तुनक मिजाज के होते जा रहे है.!
16 वर्ष की आयु मेँ : पापा जमाने के साथ
नही चल पाते, बहुत पुराने ख्यालो के
है.!

19 वर्ष की आयु मेँ : पापा लगभग सनकी होते
जा रहे है.!
20 वर्ष की आयु मेँ : हे भगवान अब
तो पापा को झेलना मुश्किल है, पता नही
मम्मी कैसे सहन कर लेती है.!
25 वर्ष की आयु मेँ : पापा तो मेरी हर बात
का विरोध करते है.!

30 वर्ष की आयु मेँ : मेरे
बच्चो को समझाना बहुत मुश्किल है, मैँ
तो पापा से बहुत डरता था.!
40 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा ने मुझे बडे
अनुशाशनिक तरीके से पाला, मुझे
भी पालना पडेगा अब.!
45 वर्ष की आयु मेँ : मैँ आश्चर्य चकित हु
कि कैसे मेरे पापा ने मुझे बडा किया होगा.?

50 वर्ष की आयु मेँ : जबकि मै
अपनी इकलोती औलाद की देखभाल भी ठीक
तरीके से नही कर पाता.!
55 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा बहुत
दुरदर्शी थे, वो हमारे भविष्य के बारे मेँ
काफी सोचते थे.!

60 वर्ष की आयु मेँ : मेरे पापा उच्च कोटि के
इन्सान है,जबकि मेरा बेटा मुझे
सनकी समझता है.!
वाकई मेँ मेरे पापा बहुत महान थे.!
पापा महान है इस बात को पुरी तरह समझने के
लिए मुझको पुरे 56 साल लग गये.!
मैं और मेरी तन्हाई

मैं और मेरी तन्हाई


मैं और मेरी तन्हाई अकसर ये बातें करते है , 
तुम होती तो कैसा होता ,तुम ये कहती तुम वो कहती, 
तुम इस बात पे हैरान होती ,तुम उस बात पे कितना हंसतीं 
तूम होती तो ऐसा होता ,तुम होती तो वैसा होता,
 मै और मेरी तन्हाई अकसर ये बाते करते है।

ये रात है, ये तुम्हारी ये जुल्फ़े खुली हुई है ,
है चाँदनी ये तुम्हारी नजरों से ये मेरी रातें धुली हुई है।
ये चाँद है ये तुम्हारा कंगन ,सितारे है ये तुम्हारा आंचल, 
हवा का झोंका है ये तुम्हारे बदन की खुशबु ,
ये पत्तियों की सरसराहट की तुमने कुछ कहा है, 
ये सोचता हूँ मै कबसे गुमसुम , की जबकि 
मुझको भी ये खबर है की तुम नहीं हो , कही नहीं हो ,
मगर ये दिल है की कह रहा की तुम यही हो यही कहीं हो।

मजबूर ये हालात इधर भी है उधर भी है , 
तन्हाई की एक रात इधर भी है उधर भी , 
कहने को बहुत कुछ है मगर किससे कहे हम , 
कब तक यु ही खामोश रहे और सहे हम 
,दिल करता है की दुनिया की हर रस्म उठा दें,
दिवार जो हम दोनों में है आज गिरा दे , 
क्यों दिल में सुलगते रहें हम आज बता दें , हाँ हमे मोहब्बत है 
मोहब्बत है मोहब्बत, अब दिल में यही बात इधर भी है उधर भी।

मै और मेरी तन्हाई अकसर ये बाते करते है तुम होती तो कैसा होता 
तुम होती तो ऐसा होता तुम होती तो वैसा होता , 
मै और मेरी तन्हाई अक्सर ये बाते करते है।

( ये वो महान रचना है जिसे अमिताभ बच्चन ने फिल्म ''सिलसिला'' के एक गीत ये कहाँ आ गये हम ,के दौरान लता मंगेशकर के साथ पढ़ी थीं। 
आज भी ये रचना इतनी ही जवान है जितनी उस समय थी। इसे आज भी अमिताभ बच्चन की आवाज में सुना जाता है। 

                                           ''आमिर अली दुबई'' 

बॉलीवुड का खुबसूरत ही मैन -धर्मेन्द्र

बॉलीवुड का खुबसूरत ही मैन -धर्मेन्द्र

दिलीप कुमार ने उन्हें अवार्ड देते हुए कहा की अगर मुझे दुबारा जिन्दगी मिली तो मै धर्मेन्द्र जैसा हेंडसम बनना पसंद करूँगा.उनकी ये बात सुनकर धर्मेन्द्र की आँखों से ख़ुशी के आंसू छलक पड़े.उन्हें जिन्दगी में पहली बार फ़िल्मी अवार्ड मिला वो भी उनके पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार के हाथों.
70 के दशक में धर्मेन्द्र को दुनिया के सबसे खूबसूरत मर्दों में से एक चुना गया था. यह सम्मान पाने वाले वह भारत के पहले शख्स थे. उनके अलावा यह सम्मान सिर्फ सलमान खान के पास है.क्‍लासिक युग के सबसे खूबसूरत अभिनेता और विश्व लौह पुरूष का खिताब जीत चुके धर्मेंद्र आज भी फिल्‍म उद्योग में अपनी शैली और प्रदर्शन के कारण लोकप्रिय बने हुए है.दिलीप कुमार उनके प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं.धर्मेन्द्र आज भी अपने आप को दिलीप कुमार का सबसे बड़ा फेन मानते हैं.वो हमेशा अपने आप में दिलीप कुमार को तलाश करते.
धर्मेन्द्र की बायोग्राफी 
8 दिसम्बर, 1935 को साहनेवाल, पंजाब में जन्मे धर्मेन्द्र ने शुरू से ही अभिनेता बनने का ख्वाब देखा था. पंजाबी जाट परिवार से संबंधित धर्मेंद्र का पूरा नाम धर्मेंद्र सिंह देओल है. धर्मेंद्र ने अपना शुरूआती बचपन फगवाड़ा, कपूरथला में व्यतीत किया.
इनके पिता केवल किशन सिंह देओल लुधियाना के गांव लालटन के एक स्कूल में हेडमास्टर थे. कुछ समय बाद धर्मेंद्र अपने परिवार के साथ कपूरथला रहने चले गए. धर्मेंद्र का कहना है कि जब वो 9वीं क्लास में थे तो पहली बार लुधियाना में दिलीप कुमार की फिल्म देखी। फिल्म देखकर जब वो बाहर निकले तो उन्हें कुछ अलग तरह का अहसास होने लगा। उसी समय उन्होंने फैसला किय़ा कि वो एक्टिंग के फील्ड में कदम आजमाएंगे। धर्मेन्द्र के पिता जी स्कूल टीचर थे इसलिए पिता के सामने तो वो अपनी बात नहीं रख पाए। लेकिन अपनी मां को उन्होंने कह दिया कि वो एक्टर बनना चाहते हैं और मुंबई जाएंगे. स्कूल के समय से ही उन्हें फिल्मों का इतना चाव था कि वह क्लास में पहुंचने के बजाय सिनेमा हॉल में पहुंच जाया करते थे. फिल्मों में प्रवेश से पहले वह रेलवे में क्लर्क थे.
फ़िल्मी  कैरियर 
1961 में उन्हें दिल भी तेरा हम भी तेरे फिल्म में पहला मौका मिला. तब से उनकी 240 से अधिक फिल्में आ चुकी हैं. इन फिल्मों में धर्मेन्द्र ने हर किस्म के रोल किए. धर्मेन्द्र की हर छवि दर्शकों को अच्छी लगी. आश्चर्य है कि इस बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक्टर को अधिक पुरस्कार और सम्मान नहीं मिले.एक रोमांटिक हीरो से एक्शन हीरो तक का सफर धर्मेन्द्र ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से गुजारा. उन्होंने अपने शुरूआती समय में लगभग सभी बेहतरीन अभिनेत्रियों जैसे नूतन, मीना कुमारी, सायरा बानो आदि के साथ अभिनय किया. लेकिन उनकी सबसे अच्छी जोड़ी बनी हेमा मालिनी के साथ जो बाद में उनकी पत्नी बनीं. दोनों ने कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया जिनमें राजा जानी, सीता और गीता, तुम हसीन मैं जवां, दोस्त, चरस, मां, चाचा भतीजा और शोले प्रमुख हैं.धर्मेन्द्र को सबसे ज्यादा “सत्यकाम” और “शोले” में अभिनय करने के लिए याद किया जाता है. अपने कॅरियर में धर्मेन्द्र ने हर किस्म के रोल किए. रोल चाहे फिल्म सत्यकाम के सीधे-सादे ईमानदार हीरो का हो, फिल्म शोले के एक्शन हीरो का हो या फिर फिल्म चुपके चुपके के कॉमेडियन हीरो का, सभी को सफलतापूर्वक निभा कर दिखा देने वाले धर्मेंद्र सिंह देओल अभिनय प्रतिभा के धनी कलाकार हैं.हर तरह की सफलता के बाद भी धर्मेन्द्र उन दो हस्तियों को आज तक नहीं भूल पाए हैं, जिन्होंने पहले साल ही उनके कंधे पर हाथ रखकर आश्वस्त कर दिया था कि वह एक दिन मशहूर होंगे. आज भी धर्मेन्द्र दिलीप कुमार और देव आनंद से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र करते समय किलकारियां भरने लगते हैं। निर्दोष मुस्कराहट उनके होठों पर आ जाती है. पिछले दिनों अपनी नई फिल्म अपने के म्यूजिक रिलीज समारोह में उन्होंने दिलीप कुमार और देव आनंद को विशेष आग्रह के साथ बुलाया था. उनकी मौजूदगी में धर्मेन्द्र के उल्लास का बखान शब्दों में नहीं किया जा सकता. शायद वे धन्यवाद दे रहे थे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की उन विभूतियों को, जिन्होंने संघर्ष की घनी धूप में आते ही प्यार की छांव दी थी.हिन्दी में वार्तालाप करते समय अंग्रेजी शब्दों के उच्चारण को कतई उचित न समझने वाले प्यारेमोहन से जो एक बार मिला हो, वह उसे कभी भूल सकता है भला! ऋषिकेश मुखर्जी की 'चुपके-चुपके' (1975) हर उस सूची में शामिल होती है जो हिन्दी सिनेमा की श्रेष्ठतम कॉमेडी फिल्मों को गिनाने के लिए बनाई जाती है
फिल्म फूल और पत्थर ने उन्हें ही-मैन बन गया.19 वर्ष की आयु में धर्मेंद्र का विवाह प्रकाश कौर के साथ संपन्न हुआ. फिल्म अभिनेता सन्नी देओल और बॉबी देओल इन्हीं के बेटे हैं. फिल्‍मों में धरमपाजी मारधाड़ के बादशाह के नाम से भी जाने जाते हैं.
धर्मेन्द्र मीना कुमारी की प्रेम कहानी 
बॉलिवुड में उनके प्रेम के किस्से मशहूर हैं जैसे मीना कुमारी के साथ प्रेम प्रसंग.बॉलिवुड में आते ही उन्हें मीना कुमारी जैसी स्थापित अभिनेत्री के साथ काम करने का अवसर मिला.फिल्मों में साथ अभिनय करते-करते धर्मेंद्र और मीना कुमारी एक दूसरे को चाहने लगे. लेकिन विडंबना देखिए उस समय मीना कुमारी कमाल अमरोही से शादी कर चुकी थीं और धर्मेंद्र तो विवाह करने के बाद ही फिल्मों में आए थे. मगर फिर भी धर्मेंद्र और मीना कुमारी एक-दूसरे के साथ समय बिताते और अपनी भावनाएं बांटते थे. धर्मेंद्र के साथ मीना कुमारी का संबंध लगभग तीन साल तक चला. लेकिन जैसे ही धर्मेंद्र को कामयाबी मिलने लगी वह मीना कुमारी को भी भूल गए. ज्यादा पीने की आदत और बीमारियों की वजह से मीना कुमारी का शरीर भारी होने लगा था. धर्मेंद्र के लिए वह एक उपयुक्त अभिनेत्री नहीं रह गई थीं. धरम ने मीना के साथ आखिरी फिल्म 1968 चंदन का पालना की. अब ही-मैन धर्मेद्र पर मर मिटने वाली हीरोइनों की कमी नहीं थी. वक्त ने धर्मेंद्र के मन में भी मीना का आकर्षण समाप्त कर दिया था.
धर्मेन्द्र हेमा मालिनी का प्रेम विवाह 

फिर हेमा मालिनी के साथ उनका प्रेम-प्रसंग और विवाह, धर्मेन्द्र- हेमा मालिनी- इन दोनों के बीच प्यार फिल्म 'शोले' के सेट्स पर पनपा. 'शोले' की शूटिंग के दौरान इनके रोमांस की खबरें खूब सुनाई देती थीं। ,तब धर्मेंद्र पहले से शादी-शुदा थे. जब इनकी पत्नी प्रकाश कौर ने इन्हें तलाक देने से इन्कार कर दिया, तब धर्मेंद्र और हेमा ने धर्म परिवर्तित करके 80 के दशक में शादी कर ली.धर्मेन्द्र हेमा के प्यार में इस कदर गुम थे कि उनसे शादी करने के लिए उन्होंने समाज से बगावत की और दुनिया की परवाह छोड़कर हेमा को अपना बनाया.अपने प्रेम-संबंध के प्रति समर्पण का प्रमाण देकर हेमा ने उनकी दूसरी पत्नी बनना भी स्वीकार कर लिया. इनकी शादी का धरम के बड़े बेटे सनी ने खुला विरोध किया था.इस जोड़ी ने एक साथ कुल 27 फिल्में कीं, जिनमें से 16 सुपर हिट रहीं .जब धर्मेद्र ने हेमा मालिनी के साथ सात फेरे लिए, तब तक दोनों एक साथ एक दर्जन से भी अधिक फिल्मों में काम कर चुके थे. बड़े बेटे सनी देओल फिल्मों में आने की तैयारी कर रहे थे. ऐसे में हेमा मालिनी से शादी करने का फैसला करना जरूर बड़ा मुश्किल रहा होगा, लेकिन दोनों ने यह फैसला कर ही लिया. फिल्म शोले के दौरान हेमा मालिनी और धर्मेन्द्र के प्रेम के किस्सों को खुद फिल्मकारों ने भी सच बताया है. फिल्मी पर्दे पर यह जोड़ी चाहे कितनी भी बेहतरीन दिखे पर असल जिंदगी में दोनों अलग-अलग रहते हैं. हेमा मालिनी और धर्मेंद्र की दो बेटियां (एशा देओल और अहाना देओल) हैं. जहां हेमा मालिनी अपनी बेटियों के साथ रहती हैं वहीं धर्मेन्द्र सन्नी और बॉबी देओल के साथ रहते हैं.हेमा मालिनी से विवाह के बाद से ही उनकी पहली पत्नी और दोनों बेटे विरोध करते रहे.आज धर्मेन्द्र दो परिवारों के मुखिया होने के बाद भी इन फासलों को नही मिटा सके.जिसकी एक झलक ईशा की शादी में भी देखने को मिली.
धर्मेंद्र अभिनेता ही नहीं बल्कि निर्माता भी हैं. वर्ष 1983 में धर्मेंद्र ने अपने बड़े बेटे सन्नी देओल को फिल्म बेताब और 1995 में छोटे बेटे बॉबी देओल को बरसात फिल्म का निर्माण कर उन्हें बॉलिवुड में प्रदार्पित किया.
वर्ष 2007 में अपने फिल्म में सन्नी, बॉबी और धर्मेंद्र पहली बार एक साथ पर्दे पर आए.धर्मेन्द्र की तरह ही उनके बेटे सन्नी देओल और बॉबी देओल के साथ उनकी बेटी ईशा देओल भी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं.

बेहतरीन कलाकार और पिता होने के साथ वह राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं. धर्मेन्द्र बीकानेर से भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सांसद रह चुके हैं.जुलाई 2011 में कलर्स चैनल पर आने वाले इंडियाज गॉट टैलेंट शो में जज के तौर पर धर्मेंद्र ने छोटे पर्दे पर भी कार्य किया.किसी भी कलाकार के लिए उसका सबसे बड़ा तोहफा उसके प्रशंसकों का प्‍यार और बंधाइयां होती है। धरमजी अपने प्रशंसकों से प्यार करते हैं और अपना फिल्‍मी जीवन जारी भी रखना चाहते हैं. उन्होंने कहा, मैं और ज्यादा अच्छी फिल्में करना चाहता हूं। मैं पोस्टर पर खुद को देखना पसंद करता हूं.दिलीप कुमार उनके प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं.धर्मेन्द्र आज भी अपने आप को दिलीप कुमार का सबसे बड़ा फेन मानते हैं.वो हमेशा अपने आप में दिलीप कुमार को तलाश करते.




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                            ''आमिर दुबई.,,,


लोकप्रियता का दूसरा नाम ''राजेश खन्ना ''

लोकप्रियता का दूसरा नाम ''राजेश खन्ना ''


उनका क्रेज इस कदर था कि लड़कियों ने उनके फोटोग्राफ से ही शादी कर ली थी और कई तो अपनी उँगली काटकर खून से ही माँग भर लेती थीं, जब उन्होंने शादी की तो कइयों ने आत्महत्या का प्रयास भी किया। एक बार जब वे बीमार पड़े, तब एक कॉलेज के ग्रुप ने उनकी तस्वीर पर बर्फ की थैली से सिंकाई की ताकि बुखार जल्दी उतर जाए, एक बार उनकी आँख में इंफेक्शन हो गया तो लड़कियों ने आईड्रॉप खरीदकर उनके पोस्टर पर ही लगाया!जी हाँ ये लोकप्रियता थी भारत के पहले सुपर स्टार ''राजेश खन्ना '' की.आज मोहब्बत नामा के कॉलम यादगार में आज की याद हैं ''राजेश खन्ना ''
29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना है. 1966 में उन्होंने पहली बार 24 साल की उम्र में आखिरी खत नामक फिल्म में काम किया था. इसके बाद राज, बहारों के सपने, औरत के रूप जैसी कई फिल्में उन्होंने की लेकिन उन्हें असली कामयाबी 1969 में आराधना से मिली. इसके बाद एक के बाद एक 14 सुपरहिट फिल्में देकर उन्होंने हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार का तमगा अपने नाम किया.अमृतसर में जन्मे जतिन खन्ना बाद में फिल्मी दुनिया में राजेश खन्ना के नाम से मशहूर हुए। उनका अभिनय करियर शुरूआती नाकामियों के बाद इतनी तेजी से परवान चढ़ा कि उसकी मिसाल बहुत कम ही मिलती हैं। परिवार की मर्जी के खिलाफ अभिनय को बतौर करियर चुनने वाले राजेश खन्ना ने वर्ष 1966 में 24 बरस की उम्र में आखिरी खत फिल्म से सिनेमा जगत में कदम रखा था। बाद में राज, बहारों के सपने और औरत के रूप में उनकी कई फिल्में आई। मगर उन्हें बॉक्स आफिस पर कामयाबी नहीं मिल सकी।
बचपन में रवि कपूर उनके क्लासमेट थे, जिनको दुनिया ने जीतेंद्र के नाम से जाना। जीतेन्द्र और राजेश खन्ना स्कूल में साथ पढ़ चुके हैं।जतिन स्कूल और कॉलेज के दिनों में थिएटर में एक्टिव रहते थे और उन्होंने इंटर कॉलेज ड्रामा कंपीटिशन जीते। बाद में जीतेंद्र और जतिन आगे साथ-साथ कॉलेज में पढ़े। जीतेंद्र जब पहली बार फिल्म ऑडिशन देने गए तो जतिन ने उनको ट्रेनिंग दी थी। जतिन खन्ना के अंकल ने उनका नाम राजेश खन्ना रखने की सलाह दी जब उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री ज्वाइन करने का फैसला किया।
वर्ष 1969 में आई फिल्म आराधना ने राजेश खन्ना के करियर को उड़ान दी और देखते ही देखते वह युवा दिलों की धड़कन बन गए। फिल्म में शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी बहुत पसंद की गई और वह हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बनकर प्रशसंकों के दिलोदिमाग पर छा गए। आराधना ने राजेश खन्ना की किस्मत के दरवाजे खोल दिए और उसके बाद उन्होंने अगले चार साल के दौरान लगातार 15 हिट फिल्में देकर समकालीन तथा अगली पीढ़ी के अभिनेताओं के लिए मील का पत्थर कायम किया। वर्ष 1970 में बनी फिल्म सच्चा झूठा के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया।वर्ष 1971 राजेश खन्ना के अभिनय करियर का सबसे यादगार साल रहा। उस वर्ष उन्होंने कटी पतंग, आनन्द, आन मिलो सजना, महबूब की मेंहदी, हाथी मेरे साथी और अंदाज जैसी सुपरहिट फिल्में दीं। दो रास्ते, दुश्मन, बावर्ची, मेरे जीवन साथी, जोरू का गुलाम, अनुराग, दाग, नमक हराम और हमशक्ल के रूप में हिट फिल्मों के जरिए उन्होंने बॉक्स आफिस को कई वर्र्षो तक गुलजार रखा। भावपूर्ण दृश्यों में राजेश खन्ना के सटीक अभिनय को आज भी याद किया जाता है।राजेश को आनन्द में यादगार अभिनय के लिये वर्ष 1971 में लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया।हिन्दी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे। जब वे चरम पर थे तब फिल्म में उनका होना फिल्म के हिट होने की गारंटी होती थी।राजेश खन्ना ने अनेक अभिनेत्रियों के साथ फिल्मों में काम किया, लेकिन शर्मिला टैगोर और मुमताज के साथ उनकी जोड़ी खासतौर पर लोकप्रिय हुई।किशोर कुमार के अनेक गाने राजेश खन्ना पर ही फिल्माए गए और किशोर के स्वर राजेश खन्ना से पहचाने जाने लगे।
डिम्पल राजेश की लव स्टोरी 
अहमदाबाद में आयोजित एक फिल्म समारोह में शामिल होने के लिए मुंबई के बहुत से नामी सितारे बुलाए गए थे। इन्हें लाने के लिए आयोजकों ने एक चार्टर्ड प्लेन का प्रबंध किया था। सितारों की इस टोली में राजेश खन्ना भी शामिल थे। प्लेन में राजेश खन्ना सुपरस्टार की हैसियत से मौजूद थे।डिम्पल राजकपूर की खोज थीं, इसलिए उन्हें भी इस टोली में जगह मिली थी। जब सभी कलाकार विमान में बैठे, तो डिम्पल के बगल में सीट खाली थी। राजेश ने उनसे पूछा, क्या मै इस सीट पर बैठ सकता हूँ ? श्योर सर, डिम्पल ने जवाब दिया। दरअसल, डिम्पल के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती थी कि बॉलीवुड का सुपरस्टार प्लेन में मौजूद अन्य नामी हीरोइनों को छोड़कर उनके पास बैठे! विमान के इस साथ ने दोनों पर जादू जैसा असर किया। राजेश के बारे में तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन डिम्पल के जेहन में तो राजेश जैसे बस गए थे। फिल्म समारोह के दौरान दोनों की बराबर मुलाकातें होती रहीं, लेकिन मुंबई पहुंचने के बाद मेल-मुलाकातें बढ़ गर्इं। हालांकि वे रेस्टोरेंट या क्लब के बदले देर रात समुद्र तट पर मिलते थे, भीड़ से दूर और रोशनी से परे। ऐसी ही पूनम की एक रात
समुंदर किनारे चांदनी रात में डिम्पल और राजेश साथ घूम रहे थे। अचानक उस दौर के सुपरस्टार राजेश ने कमसिन डिम्पल के आगे शादी का प्रस्ताव रख दिया जिसे डिम्पल ठुकरा नहीं पाईं। शादी के वक्त डिम्पल की उम्र राजेश से लगभग आधी थी।राजेश खन्ना ने वर्ष 1973 में खुद से उम्र में काफी छोटी नवोदित अभिनेत्री डिम्पल कपाडि़या से विवाह किया ,धूमधाम से सुपर स्टार की बारात निकली। डिम्पल के पिता के आवास ‘जलमहल’ में शानदार रिसेप्शन हुआ। फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े लोग इस शादी में शामिल हुए थे। खास बात यह रही कि राजेश-डिंपल की शादी की एक छोटी सी फिल्म भी उस समय देश भर के थिएटर्स में फिल्म शुरू होने के पहले दिखाई गई थी।
और वे दो बेटियों ट्विंकल और रिंकी के माता-पिता बने।हालांकि राजेश और डिम्पल का वैवाहिक जीवन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका और कुछ समय के बाद वे अलग हो गए। राजेश फिल्मों में व्यस्त रहे और डिम्पल ने भी अपने करियर को तरजीह देना शुरू किया। अलग होने के बावजूद मुसीबत में हमेशा डिम्पल ने राजेश का साथ दिया। हाल ही में वे बीमार हुए तो डिम्पल ने उनकी सेवा की। उनका चुनाव प्रचार ‍भी किया।
राजेश खन्ना की लाइफ में टीना मुनीम भी आईं। एक जमाने में राजेश ने कहा भी था कि वे और टीना एक ही टूथब्रश का इस्तेमाल करते हैं। उनकी जिंदगी में टीना मुनीम के आने से 1984 में डिंपल उनसे अलग हो गईं। लेकिन दोनों के बीच तलाक नहीं हो सका। 80 के दशक में टीना राजेश खन्ना के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहीं। टीना के बॉलीवुड छोड़ने के बाद डिंपल फिर से उनके करीब आईं। ऐसा लगा जैसे कि राजेश और डिंपल ने एक-दूसरे के बीच रहे गिले-शिकवे को भुला दिया। हालांकि अब डिम्पल और राजेश खन्ना एक लंबी जुदाई के बाद दोनों अब एक बार फिर बुढ़ापे में साथ-साथ हुए।
राजेश खन्ना की लोकप्रियता 
करीब डेढ़ दशक तक प्रशंसकों के दिल पर राज करने वाले राजेश खन्ना के करियर में 80 के दशक के बाद उतार शुरू हो गया।1969 से 1975 के बीच राजेश ने कई सुपरहिट फिल्में दीं। उस दौर में पैदा हुए ज्यादातर लड़कों के नाम राजेश रखे गए.राजेश ने फिल्म में काम पाने के लिए निर्माताओं के दफ्तर के चक्कर लगाए। स्ट्रगलर होने के बावजूद वे इतनी महंगी कार में निर्माताओं के यहां जाते थे कि उस दौर के हीरो के पास भी वैसी कार नहीं थी। 1969 में रिलीज हुई आराधना और दो रास्ते की सफलता के बाद राजेश खन्ना सीधे शिखर पर जा बैठे। उन्हें सुपरस्टार घोषित कर दिया गया और लोगों के बीच उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल हुई। सुपरस्टार के सिंहासन पर राजेश खन्ना भले ही कम समय के लिए विराजमान रहे, लेकिन यह माना जाता है कि वैसी लोकप्रियता किसी को हासिल नहीं हुई जो राजेश को ‍हासिल हुई थी।लड़कियों के बीच राजेश खन्ना बेहद लोकप्रिय हुए। लड़कियों ने उन्हें खून से खत लिखे। उनकी फोटो से शादी कर ली। कुछ ने अपने हाथ या जांघ पर राजेश का नाम गुदवा लिया। कई लड़कियां उनका फोटो तकिये के नीचे रखकर सोती थी। स्टुडियो या किसी निर्माता के दफ्तर के बाहर राजेश खन्ना की सफेद रंग की कार रुकती थी तो लड़कियां उस कार को ही चूम लेती थी। लिपिस्टिक के निशान से सफेद रंग की कार गुलाबी हो जाया करती थी। महिलाएँ ट्रैफिक सिग्नल पर उनकी कार के रुकने का इंतजार करती थीं ताकि उन्हें देख सकें। कार के रुकते ही उसके शीशों पर किस किया करती थीं। जब उनकी सफेद कार उनके कंपाउंड में वापस आती थी तो वह गुलाबी हो चुकी होती थी! संवाद अदायगी के अपने अलहदा अंदाज और छेड़ती आँखों से वे जो जादू परदे पर पैदा करते थे उसका दीवाना पूरा हिन्दुस्तान था।
निर्माता-निर्देशक राजेश खन्ना के घर के बाहर लाइन लगाए खड़े रहते थे। वे मुंहमांगे दाम चुकाकर उन्हें साइन करना चाहते थे।  पाइल्स के ऑपरेशन के लिए एक बार राजेश खन्ना को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। अस्पताल में उनके इर्दगिर्द के कमरे निर्माताओं ने बुक करा लिए ताकि मौका मिलते ही वे राजेश को अपनी फिल्मों की कहानी सुना सके।अपने प्रशंसकों के बीच, खासकर महिलाओं के बीच जो लोकप्रियता राजेश खन्ना ने पाई वह और कोई नहीं पा सका।हर लड़की उनमें अपना दोस्त, प्रेमी और पति देखती थी। उनका सुंदर, सलोना चेहरा सभी के दिल में उतर जाता था।
 उनका क्रेज इस कदर था कि लड़कियों ने उनके फोटोग्राफ से ही शादी कर ली थी और कई तो अपनी उँगली काटकर खून से ही माँग भर लेती थीं! जब राजेश खन्ना ने डिंपल से शादी की तो कइयों ने आत्महत्या का प्रयास भी किया। एक बार का वाकया है जब वे बीमार पड़े। तब एक कॉलेज के ग्रुप ने उनकी तस्वीर पर बर्फ की थैली से सिंकाई की ताकि बुखार जल्दी उतर जाए! एक बार उनकी आँख में इंफेक्शन हो गया तो लड़कियों ने आईड्रॉप खरीदकर उनके पोस्टर पर ही लगाया!
राजेश खन्ना को रोमांटिक हीरो के रूप में बेहद पसंद किया गया। उनकी आंख झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने की अदा के लोग दीवाने हो गए।राजेश खन्ना द्वारा पहने गए गुरु कुर्त्ते खूब प्रसिद्ध हुए और कई लोगों ने उनके जैसे कुर्त्ते पहने। आराधना, सच्चा झूठा, कटी पतंग, हाथी मेरे साथी, मेहबूब की मेहंदी, आनंद, आन मिलो सजना, आपकी कसम जैसी फिल्मों ने आय के नए रिकॉर्ड बनाए। आनंद फिल्म राजेश खन्ना के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जा सकती है, जिसमें उन्होंने कैंसर से ग्रस्त जिंदादिल युवक की भूमिका निभाई।
शर्मिला और मुमताज, जो कि राजेश की लोकप्रियता की गवाह रही हैं, का कहना है कि लड़कियों के बीच राजेश जैसी लोकप्रियता बाद में उन्होंने कभी नहीं देखी। इस बात से राजेश खन्ना पूरी तरह वाकिफ थे कि उनकी लोकप्रियता किस मुकाम तक पहुँच चुकी है... और वे स्वयं को आत्ममुग्ध होने से नहीं बचा पाए। सफलता के शीर्ष पर यदि कोई आपका सबसे बड़ा शत्रु होता है तो वह और कोई नहीं आप ही होते हैं। यही बात काका के लिए नुकसानदेह रही। इस बात का जब उन्हें पता चला तब तक वह दौर पूरी तरह से खत्म हो चुका था। जिस ग्लैमर को उन्होंने हासिल किया वही उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
अपनी जीवनशैली के कारण भी वे काफी विवादों में रहे। इसी कारण उन्हें अच्छी फिल्में मिलना बंद हो गईं। नाम के नशे ने उनके काम पर असर डाला। वे जब कहीं छुट्टियाँ मनाने जाते थे तो अपने साथ दोस्तों की फौज लेकर जाते थे। उन्हें हमेशा लोगों से घिरा रहना और आकर्षण का केन्द्र बना रहना पसंद था।कुछ लोग राजेश खन्ना के अहंकार और चमचों से घिरे रहने की वजह को उनकी असफलता का कारण मानते हैं। बाद राजेश खन्ना ने कई फिल्में की, लेकिन सफलता की वैसी कहानी वे दोहरा नहीं सके। राजेश ने उस समय कई महत्वपूर्ण फिल्में ठुकरा दी, जो बाद में अमिताभ को मिली। यही फिल्में अमिताभ के सुपरस्टार बनने की सीढ़ियां साबित हुईं। यही राजेश के पतन का कारण बना।राजेश खन्ना ने श्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेअर पुरस्कार तीन बार जीता और चौदह बार वे नॉमिनेट हुए। वर्तमान दौर के सुपरस्टार शाहरुख खान का कहना है कि राजेश ने अपने जमाने में जो लोकप्रियता हासिल की थी, उसे कोई नहीं छू सकता है।
उनकी बेटी ट्विंकल खन्ना इंटीरियर डेकोरेटर हैं और फिल्म एक्ट्रेस भी रही हैं। अक्षय कुमार से उनकी शादी हुई है। छोटी बेटी का नाम रिंकी खन्ना है।
मगर आज बदलता समय चंद दिनों पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना अस्पताल में भर्ती थे , लेकिन बॉलीवुड की कोई भी बड़ी हस्ती उन्हें देखने के लिये नहीं पहुंची थीं.सिर्फ अभिनेत्री रीनारॉय, समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह, उनकी मित्र अनीता आडवाणी और उनकी पूर्व प्रेमिका अंजू महेन्द्रू ,संगीतकार इस्माइल दरबार,उनकी पत्नी डिंपल, बेटी टिवंकल और रिकी और दामाद अक्षय कुमार ही उनको देखने पहुंचे थे.राजेश खन्ना जिसने बॉलीवुड को एक नयी पहचान दी.जिनके दौर में कलाकार उनके आगे पीछे घूमते नज़र आते थे.निर्माता ,निर्देशक उनके ऑफिस के चक्कर लगाते थे ,मगर आज उम्र के इस पड़ाव में कोई उन्हें देखने नही आया ,ये बेहद अफ़सोस जनक बात है.
21 जून को मुंबई के कार्टर रोड स्थित अपने बंगले 'आशीर्वाद' से हाथ हिला कर अपने प्रशंसकों का अभिवादन किया था।कामयाबी के शिखर तक पहुँचना तो ज्यादा मुश्किल नहीं होता पर वहाँ टिके रहना अधिक कठिन है। यह बात राजेश खन्ना के मामले में बिलकुल फिट बैठती है। ऐसा कहकर आलोचना नहीं की जा रही है बल्कि दुनिया का दस्तूर ही यह है। राजेश खन्ना गुरु दत्त, मीना कुमारी और गीता बाली को अपना आइडल मानते थे। दिलीप कुमार, राजकपूर, देव आनंद और शम्मी कपूर के बहुत बड़े फैन थे।आखिर में सिर्फ इनकी फेमेली ही इनका साथ निभा पाई.बुढ़ापे और बीमारी के दिनों में डिम्पल का लौट आना.अक्षय कुमार जैसा दामाद ,टिवंकल और रिंकी ,अक्षय ट्विंकल के बच्चे ,यही सब कुछ आज राजेश खन्ना की जागीर है.


(डियर रीडर्स , राजेश खन्ना की जीवनी पर ये पोस्ट मैंने कई जगह से आर्टिकल्स जमा करने के बाद तरतीब दी है.लिहाजा ये पोस्ट उन तमाम लोगों को समर्पित जहाँ जहाँ से मुझे इसके लिए मदद मिली.)

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                               ''आमिर दुबई.,,,

कॉमेडी का बादशाह ''गोविंदा ''

कॉमेडी का बादशाह ''गोविंदा ''


आज यादगार कॉलम की तीसरी पोस्ट ,और आज की याद हैं ''गोविंदा '' बॉलीवुड में बहुत सारे कॉमेडियन आये और चले गये ,लेकिन कॉमेडी किंग गोविंदा का कोई दूसरा सानी ना हो सका.जब गोविंदा और कादर खान पर्दे पर एक साथ आते थे ,तो दर्शक सीटियाँ बजाना शुरू कर देते थे.कभी बाप बेटे बनकर ,कभी ससुर दामाद बनकर ,कभी दोस्त बनकर ,कभी नौकर और मालिक बनकर ,कभी अनजान बनकर ,तरह तरह के रोल में गोविंदा और कादर खान दर्शकों की ने सराहना पाई.दर्शक इनकी हरकतें देख कर इतना हँसते की फिल्म ख़तम होने के बाद भी इसी फिल्म के द्रश्यों को याद कर करके हंस पड़ते.आज भी गोविंदा की फिल्मे टेंशन दूर करने ,तनाव दूर करने के लिए देखीं जाती हैं.
बल्कि उस ज़माने में तो ये भी कहा जाता था की डॉक्टर भी मरीज के तनाव को दूर करने के लिए गोविंदा और कादर खान की फिल्मे देखने की सलाह देते.इसी लिए गोविंदा को भारत का कॉमेडी किंग कहा जाता है.बॉलिवुड में ऐसे कॉमेडियन माने जाते हैं जिनका जादू आज भी चलता है और वह न सिर्फ कॉमेडी में बेहतरीन थे बल्कि डांस हो या ड्रामा हीरो नंबर वन तो गोविंदा ही लगते हैं. गोविंदा का जन्म 21 दिसंबर 1958 को पंजाब में हुआ था.गोविंदा के पिता अरुण अहुजा विभाजन से पहले पंजाब के गुजरांवाला में रहते थे. अनुभवी फिल्म निर्माता महबूब खान के कहने पर अरुण अहुजा मुंबई आ गए थे. 1937 में मुंबई आने के बाद महबूब खान ने उन्हें अपनी फिल्म एक ही रास्ता में अभिनय करने का अवसर दिया. अरुण अहुजा के अभिनय को औरत फिल्म में पहचान मिली. फिल्म सवेरा में एक दूसरे के साथ काम करने के बाद अरुण अहुजा और निर्मला देवी ने वर्ष 1941 में विवाह कर लिया था.  अरुण अहुजा ने अपने जीवन में एक फिल्म का निर्माण किया जिसकी वजह से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. आर्थिक हालत खराब होने के कारण अरुण अहुजा का स्वास्थ्य भी बदतर हो गया. अहुजा परिवार को अपना आलीशान घर छोड़कर छोटे से घर में रहना पड़ा जहां गोविंदा का जन्म हुआ. छ: भाई-बहनों में सबसे छोटे गोविंदा का पारिवारिक नाम चीची है. जिसका पंजाबी में अर्थ होता है सबसे छोटी अंगुली. गोविंदा ने महाराष्ट्र के वर्तक कॉलेज से कॉमर्स विषय के साथ स्नातक की उपाधि ग्रहण की लेकिन अंग्रेजी अच्छी ना होने के कारण उन्हें कहीं भी नौकरी नहीं मिली.पिता के कहने और नौकरी ना मिलने के कारण गोविंदा ने फिल्मों में रुचि लेना प्रारंभ किया. गोविंदा के मामा ने उन्हें सबसे पहले फिल्म तन-बदन में अभिनय का अवसर दिया. इसके बाद वर्ष 1985 में उन्होंने लव 86 में काम किया.फिल्म इलजाम (1986) थी. जो उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट साबित हुई थी. इस फिल्म ने गोविंदा को ना सिर्फ एक अभिनेता बल्कि एक बेहतरीन डांसर के रूप में भी स्थापित कर दिया था. इसके बाद गोविंदा के पास फिल्मों के प्रस्ताव लगातार आते रहे. आंखें, शोला और शबनम, अनाड़ी नं-1, हसीना मान जाएगी, राजा बाबू, कुली नं-1, साजन चले ससुराल, हीरो नं.-1, दीवाना-मस्ताना, पार्टनर आदि उनके कॅरियर की बेहतरीन फिल्में समझी जाती हैं.
किसी भी फिल्म में गोविंदा की उपस्थिति-मात्र दर्शकों के लिए मनोरंजन की गारंटी बन जाती है। अगर कहें, गोविंदा के आगमन ने हिन्दी फिल्मों में हास्य-रस से भरपूर फिल्मों के दौर को फिर से अस्तित्व में ला दिया है तो गलत नहीं होगा। गोविंदा की पहली उल्लेखनीय फिल्म थी लव 86। गोविंदा की फिल्म ‘इल्जाम’ 1986 में प्रदर्शित हुई थी। उसके बाद से गोविंदा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हिंदी फिल्म जगत में बतौर हास्य अभिनेता एक खास मुकाम बनाया। इस दौरान गोविंदा ने अनेकों सफल फिल्में दीं, जिनमें नम्बर-1 सीरीज की फिल्मों का खास स्थान है।



अपनी अनोखी नृत्य प्रतिभा के बल पर गोविंदा डांसिंग अभिनेता के रूप में अपनी शुरूआती पहचान बनाने में कामयाब रहें। धीरे-धीरे वे उस दौर के प्रतिभाशाली अभिनेताओं की भीड़ में शामिल हो गएं। हत्या, स्वर्ग, खुदगर्ज जैसी फिल्मों के बल पर गोविंदा की छवि एक संपूर्ण अभिनेता की बन गयी। समकालीन अभिनेताओं से खुद को अलग साबित करने की आकांक्षा के कारण गोविंदा ने अपना झुकाव हास्य-रस से भरपूर फिल्मों की ओर किया। फिर,दौर शुरू हुआ गोविंदा की हंसती-खिलखिलाती फिल्मों का। डेविड धवन के निर्देशन में गोविंदा का अभिनय और निखर कर आया। दर्शकों ने निर्देशक-अभिनेता की इस जोड़ी को खूब पसंद किया और सफल फिल्मों की श्रृंखला-सी बन गयी। शोला और शबनम, आंखें, राजा बाबू,कुली नंबर वन, साजन चले ससुराल, हीरो नंबर वन, दीवाना-मस्ताना, बड़े मियां छोटे मियां, हसीना मान जाएगी, जोड़ी नंबर वन और हालिया रिलीज पार्टनर में डेविड धवन के निर्देशन में गोविंदा की अदायगी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। गोविंदा की डुबती नईया को सलमान खान ने पार लगाया था.हालांकि,बीच-बीच में गोविंदा हास्य-अभिनेता की अपनी छवि के साथ प्रयोग करते रहें। शिकारी में उन्होंने खलनायक की भूमिका भी निभायी तो सलाम-ए-इश्क में रोमांटिक भूमिका। फिल्मी दुनिया से लगभग चौबीस वर्षो मे जुड़े रहे गोविंदा ने फिल्मों का निर्माण भी प्रारंभ कर दिया। उनके होम प्रोडक्शन के बैनर तले बनी पहली फिल्म सुख थी जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह विफल हो गयी,पर वे निराश नहीं हैं। अपने प्रोडक्शन हाउस को वे इन दिनों नयी दिशा दे रहे हैं।
गोविंदा ने सुनीता से 1987 में शादी की थी और उनके दो बच्चे नर्मदा और यशवर्धन हैं।वर्ष 2004 में कांग्रेस के टिकट पर गोविंदा ने मुंबई से लोकसभा चुनाव जीता. लेकिन जल्द ही उनका मोह भंग हो गया.
वर्ष 2008 में उन्होंने अपने एक्टिंग कॅरियर पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए राजनीति को अलविदा कह दिया.गोविंदा के सबसे पसंदीदा नायक दिलीप कुमार और धर्मेन्द्र हैं.गोविंदा का कहना है कि वह हिंदी फिल्मों के सदाबहार नायक धर्मेन्द्र की तरह दिखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि धर्मेन्द्र हमेशा से ही मेरे आदर्श रहे हैं।
गोविंदा ने कहा, "मैं धर्मेन्द्र जी की तरह तंदरुस्त दिखना चाहता हूं। वे मेरे आदर्श हैं। जब मैं खुद को आईने में देखता हूं तो खुद में धर्मेन्द्र को खोजता हूं।"
गोविंदा की जोड़ी सबसे ज्यादा कादर खान और शक्ति कपूर के साथ जँची.जिस फिल्म में गोविंदा कादर खान या गोविंदा शक्ति कपूर होते उस फिल्म को दर्शक बहुत ज्यादा पसंद करते.

इसके अलावा गोविंदा एक मात्र ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने बोलीवुड के सभी बड़े सुपर स्टार्स के साथ काम किया है.गोविंदा ने दिलीप कुमार ,राजकुमार ,राजेश खन्ना ,अमिताभ बच्चन ,शम्मी कपूर ,शशि कपूर ,धर्मेन्द्र ,रजनीकांत ,मिथुन दा ,अनील कपूर ,सलमान खान ,और भी कई स्टार्स के साथ काम किया.इस बारे में गोविंदा अपने आप को खुश किस्मत मानते हैं.गोविंदा ने अपने करियर में कई यादगार फिल्मे भी दीं. जिन्हें आज भी दर्शक देखना पसंद करते हैं.और आमिर खान तो गोविंदा को अपना पसंदीदा अभिनेता मानते हैं.हकीकत भी यही है की कॉमेडी की दुनिया में आज भी गोविंदा का कोई सानी नही है.इन्हें भारत का कॉमेडी किंग भी कहा जाता है.हम उम्मीद करते हैं की गोविंदा जल्द ही फिल्मो में वापसी करेंगे.और कॉमेडी को फिर चार चाँद लगायेंगे.


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सूरों के सरताज ''किशोर कुमार ''

सूरों के सरताज ''किशोर कुमार ''


नये कॉलम ''यादगार'' में आज की याद हैं ''किशोर दा '' किशोर दा भी मेरे सबसे फेवरेट सिंगर रहे हैं.और आज भी मै फुर्सत के लम्हात में अक्सर किशोर दा के गीत सुनना पसंद करता हूँ.आइये आज उनके बारे में रोचक जानकारियां पढ़ते हैं.और उनके जिन्दगी के पहलुओं को नजदीक से देखने की कोशिश करते हैं.
किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में वहाँ के जाने माने वकील कुंजीलाल के यहाँ हुआ था। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार अपने भाई बहनों में दूसरे नम्बर पर थे। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण में खंडवा को याद किया, वे जब भी किसी सार्वजनिक मंच पर या किसी समारोह में अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे, शान से कहते थे किशोर कुमार खंडवे वाले, अपनी जन्म भूमि और मातृभूमि के प्रति ऐसा ज़ज़्बा बहुत कम लोगों में दिखाई देता है.
मशहूर अभिनेता अशोक कुमार के भाई किशोर का भी रुझान सिनेमा की ओर कम उम्र में ही हो गया. वह बांबे टॉकीजके साथ जुड़े, जहां उनके भाई अशोक कुमार बतौर अभिनेता मौजूद थे. उनके भाई अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर कुमार अभिनय पर ध्यान देकर उनकी तरह एक सफल अभिनेता बनें.बड़े भाई की मौजूदगी का फायदा मिला और किशोर को पहली बार 1946 में फिल्म शिकारीमें छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिला. बतौर एक्टर किशोर कुमार ने 'चलती का नाम गाड़ी', 'हॉफ़ टिकेट', 'पड़ोसन' और 'झुमरु' जैसी कई फ़िल्मों में काम किया.
फ़िल्म निर्माता और निर्देशक यश चोपड़ा कहते हैं कि किशोर न सिर्फ़ गायक थे बल्कि एक एक्टर, प्रोड्यूसर, निर्देशक, निर्माता, लेखक, म्यूज़िक कम्पोज़रसभी कुछ थे.उन्होंने कहा कि जिस तरह से किशोर अपने गानों में फ़िल्म के सीन के पूर भाव डाल देते थे वो बेमिसाल था. यश चोपड़ा भी किशोर कुमार की शरारतों के बारे में बात किए बिना नहीं रह पाए और उन्होंने माना कि किशोर लोगों को रिकॉर्डिंग के समय बहुत ही हंसाते थे.
उनके साथ कई बेहतरीन गाने गाने वाली भारतरत्न गायिका लता मंगेशकर किशोर दा को याद करते हुए कहती हैं, "व्यक्तिगत तौर पर मुझे वो सबसे ज़्यादा पसंद थे. उनको पूरी समझ थी कि कौन सा गाना कैसे गाना है. वो तो किसी भी तरह का गाना गा सकते थे. गंभीर गानों को भी बिना नाटकीय हुए शानदार तरीके से गाते थे किशोर दा."लता दीदी की गायिका बहन आशा भोंसले भी किशोर दा को भुला नहीं पाई हैं.
सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने किशोर कुमार को याद करते हुए कहा, "वो तो जैसे मेरा अभिन्न अंग ही बन गए थे. उनके गानों की वजह से मैं पर्दे पर ख़ूबसूरत लगने लगा था. आने वाले समय में लोग किशोर दा की वजह से मुझे याद रखेंगे."मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख़्तर तो जैसे किशोर दा के दीवाने हैं. वो कहते हैं, "मुझे तो उनकी आवाज़ के आगे किसी की आवाज़ जंचती ही नहीं. मैं ख़ुशनसीब हूं कि मेरा लिखा पहला गाना 'देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए' उन्होंने और लता दीदी ने गाया था. वो बेहद ज़िंदादिल इंसान थे."
हर दिल अजीज फनकार किशोर कुमार को फिल्म जगत में एक ऐसे हंसमुख और संजीदा इंसान के रूप में जाना जाता था है, जिनकी उपस्थिति मात्र से माहौल खुशनुमा हो उठता था। अपने हंसते-हंसाते रहने के स्वभाव को उन्होंने अपने अभिनय और गायकी में भी खूब बारीकी से उकेरा है। उनका यही अंदाज आज भी उनके चहेतों को भाव-विभोर कर जाता है।
वर्ष 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म आराधनाके जरिए किशोर गायिकी की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए।बहुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर कुमार ने न केवल पार्श्व गायन की प्रतिभा से बल्कि अपने अभिनय और निर्देशन से भी सिने प्रेमियों को अपना दीवाना बनाया। वर्ष 1951 में बतौर मुख्य अभिनेता उन्होंने फिल्म आन्दोलनसे अपने करियर की शुरुआत की लेकिन इस फिल्म से वह अपनी पहचान नहीं बना सके। वर्ष 1953 मे प्रर्दशित फिल्म लड़कीबतौर अभिनेता उनके करियर की पहली हिट फिल्म थी। नौकरी’ (1954), ‘बाप रे बाप’ (1955), ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘दिल्ली का ठग’, (1958), ‘बेवकूफ’ (1960), ‘कठपुतली, ‘झुमरू’ (1961), ‘बाम्बे का चोर’, ‘मनमौजी’, ‘हाफ टिकट’, (1962) ‘बावरे नैन’ , ‘मिस्टर एक्स इन बाम्बे’, ‘दूर गगन की छांव में’ (1964) ‘प्यार किए जा’ (1966) ‘पड़ोसनऔर दो दूनी चार’ (1968) जैसी कई सुपरहिट फिल्में आज भी किशोर कुमार के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती हैं.किशोर कुमार हिन्दी सिने जगत के सबसे लोकप्रिय गायक के रूप में उभरे. उनके गाए हुए गाने आज भी लोगों के जहन में है. उन्हे 8 बार फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ गायक का खिताब मिला है जो अपने आप में एक कीर्तिमान है.अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहना किशोर कुमार का फितूर था. खासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में उन्होंने महारत हासिल कर ली थी.नाम पूछने पर कहते थे- रशोकि रमाकु.
किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनकी आवाज के जादू से देवआनंद सदाबहार हीरो कहलाए। राजेश खन्ना को सुपर सितारा कहा जाने लगा और अमिताभ बच्चन महानायक हो गए.
मोहम्मद रफी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज फिल्म 'रागिनी' में उधार दी। गीत हैं- 'मन मोरा बावरा।' दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फिल्म 'शरारत' में रफी से गवाया था किशोर के लिए-'अजब है दास्ताँ तेरी ये जिंदगी.किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे-'मेरे दादा-दादियों।' मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवे वाले किशोर कुमार का नमस्कार.
किशोर कुमार जिंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे। मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए। इसलिए उनकी आखिरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए। इस इच्छा को पूरा किया गया.
उन्होनें अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ एक फिल्म चलती का नाम गाड़ी में साथ काम किया था.उन्होनें लता मंगेशकर के साथ मिलकर 327 गाने गाए थे. उनसे अधिक गाने मात्र मो. रफी ने गाए थे. बचपन में एक बार किशोर का पैर हंसिए पर पड़ गया और वह इतना रोए कि उनमें यह जादुई आवाज पैदा हो गई. वह अपनी सुरीली आवाज के लिए इसी हादसे को श्रेय देते थे.किशोर कुमार के लिए 1970 और 80 का दशक बेहद खास रहा. इस दौरान उन्होंने कई ऐसे गीत गाए, जो आज भी लोगों की रुह को छू जाते हैं.
किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई और इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया। उस दौर में दिलीप कुमार जैसे सफल और शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचे अभिनेता जहाँ मधुबाला जैसी रूप सुंदरी का दिल नहीं जीत पाए वही मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनी.किशोर ने अपनी दूसरी बीवी मधुबाला से शादी के बाद मजाक में कहा था. "मैं दर्जनभर बच्चे पैदा कर खंडवा की सड़कों पर उनके साथ घूमना चाहता हूँ।" मधुबाला ज्यादा दिन जीवित नहीं रहीं १९७६ में उन्होंने योगिता बाली से शादी की मगर इन दोनों का यह साथ मात्र कुछ महीनों का ही रहा, इसके बाद योगिता बाली ने जब उनसे तलाक ले कर अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती से विवाह किया तो किशोर मिथुन से रूठ गए। लेकिन फिर दोनों में सुलह हो गई।
१९८० में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बडी थीं.
फिल्म पड़ोसनउनके कॅरियर की एक बेमिसाल फिल्म रही है. इस फिल्म में जिस तरह का मस्तमौला किरदार उन्होंने निभाया वैसा वह अपनी असल जिंदगी में भी थे.हरफनमौला सितारे किशोर कुमार की जिंदादिली और खिलंदड़पन के किस्सों की कोई कमी नहीं है.किशोर कुमार को अधिकतर फिल्मकार पसंद नहीं करते थे वह थी बिना पैसा लिए काम न करने की आदत. वह तब तक किसी गाने की रिकॉर्डिंग नहीं करते थे जब तक उन्हें पैसा नहीं मिल जाता था.एक फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्माता ने उन्हें पहले पूरे पैसे नहीं दिए तो वह फिल्म के सेट पर आधे चेहरे पर ही मेक-अप लगाकर पहुंच गए और पूछने पर कहने लगे कि आधा पैसा तो आधा मेक-अप.एक और बहुत ही हास्य घटना के अनुसार जब निर्माता आर.सी. तलवार ने उनके पैसे नहीं दिए तो वह हर दिन तलवार के घर सुबह-सुबह पहुंच कर बाहर से ही चिल्लाने लगते हे तलवार, दे दे मेरे आठ हजार.पर कई बार उन्होंने निर्माताओं के लिए फ्री में भी गाना गाए हैं. किशोर कुमार बहुत ही दयावान और दूसरों की मदद के लिए भी जाने जाते थे. काफी लोग उनके अक्खड़ और मस्तमौला व्यवहार की आलोचना भी करते थे लेकिन वह किसी की परवाह नहीं करते थे. अपने घर के बाहर उन्होंने किशोर से सावधानका बोर्ड लगा रखा था.वर्ष 1948 तक कालेज में पढ़े और फिर इन्दौर छोडकर मुंबई चले गये। लेकिन बताया जाता हे कि तब कैटीन वाले के उन पर पांच रुपये बारह आना बकाया रह गये थे.माना जाता है कि इसी पांच रुपैया बारह आना को उन्होंने अपनी फिल्म चलती का नाम गाड़ी (1958) में गीत का मुखड़ा बना दिया.किशोर कुमार एक ऐसी शख्सियत थे, जिसमें बहुमुखी प्रतिभा होने के साथ वह सब था जिसकी वजह से लोग उन्हें महान मानते थे. एक गायक और अभिनेता होने के साथ किशोर कुमार ने लेखक, निर्देशक, निर्माता और संवाद लेखक तक की भूमिका निभाई. सिर्फ हिन्दी ही नहीं बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नड़ जैसी कई फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा. एक बेहतरीन गायक होने के साथ किशोर कुमार को उनकी कॉमेडियन अदाकारी के लिए आज भी याद किया जाता है.
फिल्म डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना जैसी कई फिल्मों में आज के महानायक अमिताभ बच्चन के लिए गा चुके किशोर कुमार 1980 के दशक के मध्य में एक बार उनसे इसलिए नाराज हो गए थे क्योंकि अमिताभ ने किशोर की एक होम प्रोडक्शन फिल्म में अतिथि कलाकार की भूमिका नहीं की थी. किशोर ने बिग बी के लिए गाना बंद कर दिया था. बाद में सुलह हो गई.भारत की आखरी ब्लैक एंड वाइट फिल्म 1971 मे बनी दूर का राही थी जिस के डाइरेक्टर, एक्टर, सिंगर सब किशोर कुमार ही थे. वैसे किशोर कुमार एक गायक, अभिनेता, संगीत नेर्देशक, निर्माता, लेखक, गीतकार आदि सब कुछ रह चुके है.गायक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक किशोर कुमार ने 1987 को अंतिम सांस ली। मौत के पहले उन्होंने अंतिम गीत फिल्म 'वक्त की आवाज़' (1988) के लिए गाया जो मिथुन पर फिल्माया गया था।
वर्ष 1987 में किशोर कुमार ने यह निर्णय लिया कि वह फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वापस अपने गांव खंडवा लौट जाएंगे. वह अक्सर कहा करते थे कि दूध जिलेबी खायेंगे खंडवा में बस जाएंगे.लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रह गया. 13 अक्टूबर, 1987 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनकी मौत हो गई. उनकी आखिरी इच्छा के अनुसार उनको खंडवा में ही दफनाया गया. किशोर कुमार की मौत से भारतीय सिनेमा जगत को बहुत बड़ा झटका लगा था.
आइये चलते चलते आपको किशोर दा का एक मशहूर गीत ''पल पल दिल के पास '' सुनाता और दिखाता हूँ.ये गीत राखी गुलजार और धर्मेन्द्र पर फिल्माया गया था.लेकिन आज भी इस गीत के लिए किशोर कुमार को याद किया जाता है.मेरी नज़र में इससे रोमेंटिक गीत कोई है ही नही.
( नोट : ये आर्टिकल मैंने अलग अलग कई जगह से दुसरे कई आर्टिकल्स की मदद से जमा करके तैयार किया है.जहाँ जहाँ से मुझे इसके लिए मदद मिली ,उन सभी का दिल से शुक्रिया.)
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कादर खान ''एक सम्पूर्ण कलाकार''

कादर खान ''एक सम्पूर्ण कलाकार''


आज मै अपनी इस पोस्ट के साथ एक नया कॉलम शुरू कर रहा हूँ,इस नये कॉलम का नाम होगा ''यादगार'' जिसमे मै कुछ प्रसिद हस्तियों के बारे में आर्किकल लिखूंगा और उनको याद करूँगा.
आइये सबसे पहले मै शुरू करूँगा अपने एक पसंदीदा कलाकार के से.जिनका नाम है ''कादर खान'' आप भी कादर खान को बहुत मिस करते होंगे ना ? वो कलाकार ही ऐसे हैं कि उनकी याद आती ही है। फिल्म इंडस्ट्री के बेमिसाल कलाकारों में हैं कादर खान. वो अभिनेता तो हैं ही स्क्रिप्ट राइटर भी हैं। लंबे समय से कादर खान फिल्म और टीवी से दूर रहे हैं.
कादर खान का जन्म 22 अक्तूबर 1937 में अफगानिस्तान के काबुल में हुआ था। कादर खान ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई उस्मानिया विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अरबी भाषा के प्रशिक्षण के लिये एक संस्थान की स्थापना करने का निर्णय लिया। कादर खान ने अपने करियर की शुरूआत बतौर प्रोफेसर मुंबई में एम.एस. सब्बों सिद्धिक कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग से की।एक बार कॉलेज में हो रहे वार्षिक समारोह में कादर खान को अभिनय करने का मौका मिला। इस समारोह में अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर खान के अभिनय से काफी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्म सगीनामें काम करने का प्रस्ताव दिया.1983 में प्रदर्शित फिल्म कुलीकादर खान के करियर की सुपरहिट फिल्मों में शुमार की जाती है.फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुयी। इसके साथ ही कादर खान फिल्म इंडस्ट्री के चोटी के खलनायकों की फेहरिस्त में शामिल हो गए।
कई फिल्मो में केन्द्रीय भूमिका निभाने वाले कादर खान प्रोफ़ेसर भी रह चुके हैं.और राइटर भी.कई फिल्मो की कहानियां इनके कलम से निकली.और कई यादगार फिल्मे कादर खान ने लिखी.जिन दिनों कादर खान फिल्म इंडस्ट्री में आये थे ,उन दिनों कई फिल्मो में उन्होंने विलेन की भूमिकाएँ निभाई.बहुत ही जालिम ,और खतरनाक विलेन की भूमिका होती थी.वो भी ऐसी की दर्शक उनकी भूमिका से नफरत करते नज़र आयें.हालाँकि कई उन्ही की लिखी हुई फिल्मो में उन्होंने विलेन का रोल प्ले किया.हर स्टोरी में उन्होंने हर किरदार के साथ इंसाफ किया.फिर ये फिल्मो में बाप की भूमिका में आने लगे.कभी कोमेडियन की भूमिका निभाकर लोगों को गुदगुदाया.

बल्कि जिस फिल्म में कादर खान +शक्ति कपूर हों ,उस फिल्म का हिट होना तय था.या जिस फिल्म में कादर खान +गोविंदा हों उस फिल्म का हिट होना भी तय था.गोविंदा और शक्ति कपूर के साथ कादर खान की जोड़ी को लोग बहुत ज्यादा पसंद करते थे.कादर खान हर फन में माहिर अभिनेता हुए हैं.
प्रोफ़ेसर ,राइटर ,डायरेक्टर ,विलेन ,हीरो ,कोमेडियन ,बाप ,हर तरह के रोल कादर खान पर फिट बैठते थे.
कादर खान और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कई फिल्में कीं. अदालत, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, नसीब और कुली जैसी बेहद कामयाब फिल्मों में इन दोनों ने साथ काम किया. कादर खान ने अमर अकबर एंथनी, सत्ते पे सत्ता और शराबी जैसी फिल्मों के संवाद भी लिखे.कादर खान कुछ सालों से फिल्मों से दूर हो गए हैं. इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, "वक्त के साथ फिल्में भी बदल गई हैं. अब ऐसे दौर में मैं अपने आपको फिट नहीं पाता. मेरे लिए बदलते दौर के साथ खुद को बदलना संभव नहीं है, तो मैंने अपने आपको फिल्मों से अलग कर लिया."
विलेन से लेकर कॉमेडियन तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर खान अब तक 300 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं। लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती। वह 80 से अधिक लोकप्रिय फिल्मों के लिए संवाद लिख कर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं. अमर अकबर एंथोनी, शराबी, लावारिस और कुली के संवाद आज भी अगर दर्शकों की जुबां पर हैं, बाप नंबरी बेटा दस नंबरी, तकदीरवाला, दूल्हे राजा, जुदाई, कुली नं0.। और राजा बाबू जैसी फिल्में लोगों को अगर अभी भी गुदगुदाती हैं तो उसका एक बड़ा कारण कादर खान ही हैं। बॉलीवुड के प्रख्यात निर्देशक मनमोहन देसाई का कहना था, आज तक मैने जितने संवाद लेखकों के साथ काम किया है, कादर खान उन सबमें सर्वश्रेष्ठ हैं। उन्हें आम बोलचाल की भाषा आती है। मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है। कादर खान ने अपने करियर की शुरूआत एक शिक्षक के तौर पर की। अभिनय का मौका उन्हें दिलीप कुमार ने दिया। यही कारण है कि कादर के अंदर एक शिक्षक, एक संवाद लेखक और एक अभिनेता तीनों एक साथ बसते हैं। फिल्म जगत में उन्होंने इसका भरपूर उपयोग किया। सत्तर और अस्सी के दशक में वह संवाद लेखक थे, वहीं एक दुष्ट खलनायक भी, जिसकी कुटिल मुस्कान खासी खतरनाक हुआ करती थी। उनकी वही खौफनाक मुस्कान वक्त के साथ हंसी के फुहारों में बदल गई। डेविड धवन की फिल्मों में गोविंदा के साथ उन्होंने दर्शकों को खूब लोट-पोट किया।इन्ही फिल्मों में से एक खूबसूरत  फिल्म है "साजन" लोरेन्स डीसूजा की यह फिल्म इस समय के शीर्ष कलाकार संजय दत्त ,सलमान खान व माधुरी दीक्षित  के अभिनय से सजी है.वहीँ इस फिल्म की खास बात कादर खान ही रहे.कादर खान के अभिनय की एक विशेषता यह है कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए उपयुक्त हैं। फिल्म कुली एवं वर्दी में एक क्रूर खलनायककी भूमिका हो या फिर कर्ज चुकाना है’, ‘जैसी करनी वैसी भरनीफिल्म में भावपूर्ण अभिनय या फिर बाप नंबरी बेटा दस नंबरीऔर प्यार का देवताजैसी फिल्मों में हास्य अभिनय इन सभी चरित्रों में उनका कोई जवाब नहीं है.
1990 में प्रदर्शित फिल्म बाप नंबरी बेटा दस नंबरीकादर खान के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में कादर खान और शक्ति कपूर ने बाप और बेटे की भूमिका निभाई जो ठग बनकर दूसरों को धोखा दिया करते है। फिल्म में कादर खान और शक्ति कपूर ने अपने कारनामों के जरिये दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये कादर खान फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित भी किए गए.1998 में प्रदर्शित फिल्म दुल्हे राजामें अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी भूमिका दर्शको के बीच काफी पसंद की गयी। कादर खान के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेता शक्ति कपूर के साथ काफी पसंद की गयी। इन दोनों अभिनेताओं ने अब तक लगभग 100 फिल्मों में एक साथ काम किया है।उनकी जोड़ी वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में से कुछ इस प्रकार है नसीब, लूटमार, हिम्मतवाला, महान, हैसियत, जस्टिस चौधरी, अक्लमंद, मकसद, मवाली, तोहफा, इंकलाब, कैदी, गिरफ्तार, घर संसार, धर्म अधिकारी, सिंहासन सोने पे सुहागा, मास्टरजी, इंसानियत के दुश्मन,वक्त की आवाज, जैसी करनी वैसी भरनी, नाचने वाले गाने वाले, राजा बाबू आदि.कादर खान ने कई फिल्मों में संवाद लेखक के तौर पर भी काम किया है। इनमें खेल खेल में,रफूचक्कर,धरमवीर, अमर अकबर एंथोनी, खून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, मिस्टर नटवर लाल, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, देश प्रेमी, सनम तेरी कसम, धर्मकांटा, कुली, शराबी, गिरफ्तार, कर्मा, खून भरी मांग, हत्या, हम, कुली नंबर वन, साजन चले ससुराल जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल है.कादर खान अमिताभ बच्चन को लेकर खुद एक फिल्म बनाना चाहते थे और उनकी ये तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी.अदाकारी कामेडी की हो या जानदार डॉयलाग का कमाल हो,कादर खान ने हर फन में खुद को साबित किया है.
फिल्मी दुनिया के हर फन से वाकिफ अदाकार कादर खान कुछ दिनों पहले चंडीगढ़ के एयरपोर्ट पर व्हील चेयर पर नजर आए तो उनके प्रशंसक हैरान रह गए.उनके प्रशंसकों ने उन्हें गुलदस्ते भेंट किए और ऑटोग्राफ लिए.

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            ''आमिर दुबई.,,,